सत्ता के वैकल्पिक केंद्र NCERT Solutions Class 12 Political science – यहाँ पर नीचे कक्षा ’12’ के “समकालीन विश्व राजनीति” एनसीईआरटी पुस्तक के चौथे अध्याय ‘सत्ता के वैकल्पिक केंद्र’ के सभी प्रश्न व उनके उत्तर दिए जा रहे हैं। यह सभी प्रश्न व उत्तर (PDF Form) में भी उपलब्ध हैं।

‘सत्ता के वैकल्पिक केंद्र’ NCERT Solutions class 12 Political Science: Contemporary World Politics (समकालीन विश्व राजनीति): Alternatives Centres of Power Chapter 4 (Hindi Medium)

CHAPTER 4: सत्ता के वैकल्पिक केंद्र (TEXTBOOK SOLUTIONS):


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प्रश्न 1. तिथि के हिसाब से इन सबको क्रम दें :

(क) विश्व व्यापार संगठन में चीन का प्रवेश
(ख) यूरोपीय आर्थिक समुदाय की स्थापना
(ग) यूरोपीय संघ की स्थापना
(घ) आसियान क्षेत्रीय मंच की स्थापना

उत्तर:

(ख) यूरोपीय आर्थिक समुदाय की स्थापना
(घ) आसियान क्षेत्रीय मंच की स्थापना
(ग) यूरोपीय संघ की स्थापना
(क) विश्व व्यापार संगठन में चीन का प्रवेश


प्रश्न 2. ‘ASEAN way’ या आसियान शैली क्या है ?

  1. आसियान के सदस्य देशों की जीवन शैली है।
  2. आसियान सदस्यों के अनौपचारिक और सहयोगपूर्ण कामकाज की शैली को कहा जाता है।
  3. आसियान सदस्यों की रक्षानीति है।
  4. सभी आसियान सदस्य देशों को जोड़ने वाली सड़क है।

उत्तर: (2) आसियान सदस्यों के अनौपचारिक और सहयोगपूर्ण कामकाज की शैली को कहा जाता है।


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प्रश्न 3. इनमें से किसने ‘खुले द्वार’ की नीति अपनाई ?

  1. चीन
  2. यूरोपीय संघ
  3. जापान
  4. अमेरिका

उत्तर: (1) चीन


प्रश्न 4. खाली स्थान भरें:

  1. 1962 में भारत और चीन के बीच  ……………. और ……………. को लेकर सीमावर्ती लड़ाई हुई थी।
  2. आसियान क्षेत्रीय मंच के कामों में ………….  और…………………करना शामिल हैं।
  3. चीन ने 1972 में …………… के साथ दोतरफा संबंध शुरू करके अपना एकांतवास समाप्त किया।
  4. …………. योजना के प्रभाव से 1948 में यूरोपीय आर्थिक सहयोग संगठन की स्थापना हुई।
  5. ………………आसियान का एक स्तम्भ है जो इसके सदस्य देशों की सुरक्षा के मामले देखता है।

उत्तर:

  1. (a) अरुणाचल प्रदेश के कुछ इलाकों,   (b) लद्दाख के अक्साई चीन क्षेत्र
  2. (a) सामाजिक, आर्थिक उन्नति,    (b) शांति व्यवस्था कायम
  3. अमेरिका
  4. मार्शल
  5. आसियान सुरक्षा समुदाय

प्रश्न 5. क्षेत्रीय संगठनों को बनाने के उद्देश्य क्या हैं ?

उत्तर: दूसरे विश्व युद्ध के पश्चात अमेरिका और सोवियत संघ दो महाशक्तियाँ उभरकर सामने आई और उनकी आपस की स्पर्धा के कारण संसार में असुरक्षा, अशांति, भय तथा तनाव का वातावरण बना रहा। इसी प्रकार सोवियत संघ विघटन के बाद अमेरिकी वर्चस्व शांति के लिए खतरा साबित हुआ। इसलिए ऐसी स्थिति से बचने के लिए विश्व के देश अपने क्षेत्रीय संगठन बनाते हैं।

क्षेत्रीय संगठनों को बनाने के उद्देश्य निम्नलिखित प्रकार से व्यक्त कर सकते हैं:

  1. क्षेत्रीय संगठन क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा देते हैं और क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों में तेजी लाने की भूमिका निभाते हैं। इससे क्षेत्रीय संगठन के सदस्य देशों को आर्थिक उन्नति की अधिक आशा होती है।
  2. क्षेत्र संगठन आकार में छोटे होते हैं और उनके सदस्य देशों में एकता की भावना जल्दी मजबूत हो जाती है।
  3. क्षेत्रीय संगठन विश्व में शक्ति संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं जिससे कोई भी देश या संगठन वर्चस्व प्राप्त नहीं कर पाता और संसार के देश किसी भी देश की दादागिरी से बचे रहते हैं।
  4. क्षेत्रीय संगठन सदस्यों के आपसी व्यापार को बढ़ाने में अधिक सुविधा प्रदान करते हैं क्योंकि व्यापारिक गतिविधियों पर नजदीक से और अच्छी नजर रखी जा सकती है।
  5. क्षेत्रीय संगठन के सदस्यों की संख्या अधिक नहीं होती इसलिए उन्हें अपने विवाद आपसी बातचीत से निपटने में सुविधा रहती है। साथ ही क्षेत्र संगठन के सदस्यों का एक- दूसरे से आमने-सामने के संबंध होने के कारण एक-दूसरे की बात या पड़ोसी राज्य के सुझाव जल्दी मान लेते हैं।

प्रश्न 6. भौगोलिक निकटता का क्षेत्रीय संगठनों के गठन पर क्या असर होता है ?

उत्तर:

  1. भौगोलिक निकटता का क्षेत्रीय संगठनों के गठन पर गहरा प्रभाव पड़ता है, क्योंकि विशेष क्षेत्र में आने वाले देशों में संगठन की भावना विकसित होती हैं। इस भावना के कारण परस्पर संघर्ष व युद्ध का स्थान शांति व सहयोग ले लेते हैं।
  2. भौगोलिक एकता के कारण विकास की संभावनाएँ ज्यादा होती हैं। राष्ट्र बड़ी आसानी से सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था करके, कम धन व्यय करके अपने लिए सैन्य बल गठित कर सकते हैं और बचे हुए धन को कृषि, उद्योग, विद्युत, यातायात, शिक्षा, सड़क, संचार, स्वास्थ्य आदि सुविधाओं को जुटाने और जीवन स्तर को ऊँचा उठाने में प्रयोग कर सकते हैं।
  3. एक क्षेत्र के विभिन्न राष्ट्र यदि क्षेत्रीय संगठन बना लें तो वे परस्पर सड़क मार्ग और रेलवे सेवाओं से बड़ी आसानी से जुड़ सकते हैं। इस प्रकार भौगोलिक निकटता के कारण क्षेत्र विशेष में आने वाले देशों में संगठन की भावना विकसित होती है।
  4. यदि क्षेत्रीय संगठनों में अच्छा सहयोग बन जाए तो वे अपना अधिक विकास कर सकते हैं। इसके कारण उनमें अपने प्राकृतिक संसाधनों का अधिकतम उपयोग करने की क्षमता विकसित होगी जिसके परिणामस्वरुप वे अपने आर्थिक विकास के मार्ग की ओर अग्रसर हो सकते हैं।

प्रश्न 7. ‘आसियान विजन – 2020’ की मुख्य बातें क्या हैं ?

उत्तर:  ‘आसियान विजन- 2020’ की मुख्य बातें निम्नलिखित हैं:

  1. आसियान तेजी से बढ़ता हुआ एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्रीय संगठन है। इसके विजन दस्तावेज़ 2020 में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में आसियान की एक बहिर्मुखी भूमिका को प्रमुखता दी गई है।
  2. इस दस्तावेज़ में इस बात पर विशेष बल दिया गया हैं कि आसियान द्वारा टकराव की जगह बातचीत को बढ़ावा देने की नीति प्राथमिकता दी जाएगी। इसी के मद्देनज़र आसियान ने कंबोडिया के टकराव को समाप्त किया, पूर्वी तिमोर के संकट को सम्भाला है और पूर्व-एशियाई सहयोग पर बातचीत के लिए 1999 से नियमित रूप से वार्षिक बैठक आयोजित की है।

प्रश्न 8. आसियान समुदाय के मुख्य स्तंभों और उनके उद्देश्यों के बारे में बताएँ।

उत्तर: 2003 में आसियान ने आसियान सुरक्षा समुदाय, आसियान आर्थिक समुदाय और आसियान सामाजिक- सांस्कृतिक-समुदाय नामक तीन स्तम्भों के आधार पर आसियान समुदाय बनाने की दिशा में कदम उठाए जो कुछ हद तक यूरोपीय संघ से मिलता-जुलता है।

  1. आसियान सुरक्षा समुदाय: आसियान सुरक्षा समुदाय क्षेत्रीय विवादों को सैनिक टकराव तक न ले जाने की सहमति पर आधारित है। आसियान मुख्यत सदस्य देशों में शांति, निष्पक्षता, सहयोग, अहस्तक्षेप को बढ़ावा देने और राष्ट्रों के आपसी अंतर तथा संप्रभुता के अधिकारों का सम्मान करने का उद्देश्य रखता हैं। आसियान के देशों की सुरक्षा और विदेश नीतियों में तालमेल बनाने के लिए ही 1994 में आसियान क्षेत्रीय मंच की स्थापना की गई।
  2. आसियान आर्थिक समुदाय: आसियान आर्थिक समुदाय का उद्देश्य आसियान देशों का साझा बाजार और उत्पादन आधार तैयार करना तथा इस इलाके के सामाजिक और आर्थिक विकास में मदद करना है। इतना ही नहीं, इसका उद्देश्य इस क्षेत्र के देशों के आर्थिक विवादों को निपटाने के लिए बनी मौजूदा व्यवस्था में सुधार करना भी हैं।
  3. आसियान सामाजिक – सांस्कृतिक-समुदाय: इसका उद्देश्य हैं कि आसियान देशों के बीच टकराव की जगह बातचीत और सहयोग को बढ़ावा दिया जाए तथा इन देशों के बीच संवाद और परामर्श की व्यवस्था रहे। अत: ‘आसियान’ एशिया का एकमात्र ऐसा क्षेत्रीय संगठन है जो एशियाई देशों और विश्व शक्तियों को राजनैतिक और सुरक्षा मामलों पर चर्चा के लिए राजनैतिक मंच उपलब्ध कराता है।

प्रश्न 9. आज की चीनी अर्थव्यवस्था नियंत्रित अर्थव्यवस्था से किस तरह अलग है ?

उत्तर: इसमें कोई दोराहे नहीं कि आज की चीनी अर्थव्यवस्था नियंत्रित अर्थव्यवस्था से बिलकुल भिन्न हैं। आर्थिक शक्ति के रूप में चीन के उदय को विश्व भर में चीन की दीवार व ड्रैगन के रूप में देखा जाता है। अपनी तेज़ आर्थिक वृद्धि के कारण चीन जहाँ विश्व की शक्ति का तीसरा बड़ा केंद्र बन रहा हैं,वही चीन की निरंतर आर्थिक वृद्धि को देखकर विशेषज्ञों का मानना हैं की 2040 तक वह दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति, अमरीका से भी आगे निकल जाएगा।

सन् 1970 के दशक एवं उसके बाद से कुछ महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए जिसके परिणामस्वरूप चीनी अर्थव्यवस्था विश्व की एक महत्वपूर्ण अर्थव्यवस्था के रूप में विकसित हुई। चीन द्वारा किए गए आर्थिक प्रयासों को निम्नलिखित रूप में देखा जा सकता हैं:

  1. चीनी नेतृत्व ने 1970 के दशक में कुछ बड़े नीतिगत निर्णय लिए। चीन ने 1972 में अमरीका से संबंध बनाकर अपने राजनैतिक और आर्थिक एकांतवास को खत्म किया परिणाम स्वरूप उसके विदेशी व्यापर का रास्ता भी खुल गया। 1972 में चीन संयुक्त राष्ट्र संघ का स्थाई सदस्य भी बन गया।
  2. सन् 1973 में प्रधानमंत्री चाऊ एनलाई ने कृषि, उद्योग, सेना और विज्ञान-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आधुनिकीकरण के चार प्रस्ताव रखे।
  3. सन् 1978 में तत्कालीन नेता देंग श्याओपेंग ने चीन में आर्थिक सुधारों और ‘ खुलेद्वार की नीति’ की घोषणा की। अब नीति यह हो गयी कि विदेश पूंजी और प्रौद्योगिकी के निवेश से उच्चतर उत्पादकता को प्राप्त किया जाए। बाजारमूलक अर्थव्यवस्था को अपनाने के लिए चीन ने अपना तरीका आजमाया। चीन ने ‘शॉक थेरेपी ‘ पर अमल करने के बजाय अपनी अर्थव्यवस्था को चरणबद्ध ढंग से खोला।
  4. सन् 1982 में खेती का निजीकरण किया गया और उसके बाद 1998 में उद्योगों का। व्यापार संबंधी अवरोधों को सिर्फ ‘विशेष आर्थिक क्षेत्रों’ के लिए ही हटाया गया है जहाँ विदेशी निवेशक अपने उद्यम लगा सकते हैं।
  5. व्यापार के नये कानून तथा विशेष आर्थिक क्षेत्रों (स्पेशल इकॉनामिक जोन-SEZ) के निर्माण से विदेश-व्यापार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। चीन पूरे विश्व में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए सबसे आकर्षक देश बनकर उभरा। चीन के पास विदेशी मुद्रा का अब विशाल भंडार है और इसके दम पर चीन दूसरे देशों में निवेश करता है।
  6. चीन 2001 में विश्व व्यापार संगठन में शामिल हो गया। इस तरह दूसरे देशों के लिए अपनी अर्थव्यवस्था खोलने की दिशा में चीन ने एक कदम और बढ़ाया। अब चीन की योजना विश्व आर्थिकी से अपने जुड़ाव को और गहरा करके भविष्य की विश्व व्यवस्था को एक मनचाहा रूप देने की थी।

क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर चीन एक ऐसी जबरदस्त आर्थिक शक्ति बनकर उभरा है कि सभी उसका लोहा मानने लगे हैं। चीन की अर्थव्यवस्था का बाहरी दुनिया से जुड़ाव और पारस्परिक निर्भरता ने अब यह स्थिति बना दी है कि अपने व्यावसायिक साझीदारों पर चीन का जबरदस्त प्रभाव बन चुका है और यही कारण है कि जापान, अमरीका, आसियान और रूस सभी व्यापार के आगे चीन से बाकी विवादों को भुला चुके हैं।


प्रश्न 10. किस तरह यूरोपीय देशों ने युद्ध के बाद की अपनी परेशानियाँ सुलझाई ? संक्षेप में उन कदमों की चर्चा करें जिनसे होते हुए यूरोपीय संघ की स्थापना हुई।

उत्तर: यूरोपीय संघ की स्थापना दूसरे विश्व युद्ध का परिणाम कही जा सकती हैं। 1945 तक यूरोपीय देशों ने अपनी अर्थव्यवस्थाओं की बर्बादी तो झेली ही, उन मान्यताओं और व्यवस्थाओं को ध्वस्त होते भी देख लिया जिन पर यूरोप खड़ा हुआ था। अत: यूरोप के नेताओं ने निम्न तरीकों से अपनी परेशानियों को सुलझाया:

  1. नाटो और यूरोपीय आर्थिक संगठनों की स्थापना: 1945 केबाद यूरोप के देशों में मेल-मिलाप को शीतयुद्ध से भी मदद मिली। अमरीका ने यूरोप की अर्थव्यवस्था के पुनर्गठन के लिए जबरदस्त मदद की। इसे मार्शल योजना के नाम से जाना जाता है। अमेरिका ने ‘नाटो’ के तहत एक सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था को जन्म दिया। मार्शल योजना के तहत ही 1948 में यूरोपीय आर्थिक सहयोग संगठन की स्थापना की गई जिसके माध्यम से पश्चिमी यूरोप के देशों को आर्थिक मदद दी गई।
  2. यूरोपीय परिषद और आर्थिक समुदाय: 1949 में गठित यूरोपीय परषिद राजनैतिक सहयोग के मामले में एक अगला कदम साबित हुई। यूरोप के पूँजीवादी देशों की अर्थव्यवस्था के आपसी एकीकरण की प्रक्रिया चरणबद्ध ढंग से आगे बढ़ी जिसके परिणामस्वरूप 1957 में यूरोपीयन इकॉनामिक कम्युनिटी का गठन हुआ।
  3. यूरोपीय पार्लियामेंट का गठन: यूरोपीयन पार्लियामेंट के गठन के बाद इस प्रक्रिया ने राजनीतिक स्वरूप प्राप्त कर लिया। सोवियत गुट के पतन के बाद इस प्रक्रिया में तेजी आयी और 1992 में इस प्रक्रिया की परिणति यूरोपीय संघ की स्थापना के रूप में हुई। यूरोपीय संघ के रूप में समान विदेश और सुरक्षा नीति, अतिरिक मामलों तथा न्याय से जुड़े मुद्दों पर सहयोग और एकसमान मुद्रा के चलन के लिए रास्ता तैयार हो गया।
  4. यूरोपीय संघ का बनना: एक लम्बे समय में बना यूरोपीय संघ आर्थिक सहयोग वाली व्यवस्था से बदलकर ज्यादा से ज्यादा राजनैतिक रूप लेता गया है। अब यूरोपीय संघ स्वयं काफी हद तक एक विशाल राष्ट्र-राज्य की तरह ही काम करने लगा है। हाँलाकि यूरोपीय संघ का एक संविधान बनानेकी कोशिश तो असफल हो गई लेकिन इसका अपना झंडा, गान, स्थापना-दिवस और अपनी मुद्रा है।

प्रश्न 11. यूरोपीय संघ को क्या चीजें एक प्रभावी क्षेत्रीय संगठन बनाती हैं।

उत्तर: यूरोपीय संघ को एक प्रभावशाली क्षेत्रीय संगठन बनाने में कई बातों का महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है, जिनका वर्णन निम्नलिखित हैं:

  1. यूरोपीय संघ की भौगोलिक स्थिति व उनकी भौगोलिक निकटता इस क्षेत्रीय संगठन को मजबूती प्रदान करती हैं।
  2. यूरोपीय संघ का अपना स्थापना दिवस, झंडा, राष्ट्रीय गान एवं ‘यूरो’ मुद्रा आदि से यूरोपीय देशों के एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय संगठन की पहचान प्रदान करते हैं।
  3. यूरोपीय संघ का आर्थिक, राजनैतिक, कूटनीतिक तथा सैनिक प्रभाव बहुत जबरदस्त है। विश्व व्यापार में इसकी हिस्सेदारी अमरीका से तीन गुनी ज्यादा है और इसी के चलते यह अमरीका और चीन से व्यापारिक विवादों में पूरी धौंस के साथ बात करता है। यह विश्व व्यापार संगठन जैसे अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संगठनों के अंदर एक महत्त्वपूर्ण समूह के रूप में काम करता है।
  4. यूरोपीय संघ के दो सदस्य देश ब्रिटेन और फ्रांस सुरक्षा परिषद् के स्थाई सदस्य हैं। यूरोपीय संघ के कई और देश सुरक्षा परिषद् के अस्थायी सदस्यों में शामिल हैं। इसके चलते यूरोपीय संघ अमरीका समेत सभी मुल्कों की नीतियोंको प्रभावित करता है।
  5. सैनिक ताकत के हिसाब से यूरोपीय संघ के पास दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी सेना है। इसका कुल रक्षा बजट अमरीका के बाद सबसे अधिक है।

प्रश्न 12. चीन और भारत की उभरती अर्थव्यवस्थाओं में मौजूदा एकधुर्वीय विश्व व्यवस्था को चुनौती दे सकने की क्षमता है। क्या आप इस कथन से सहमत हैं? अपने तर्कों से अपने विचारों को पुष्ट करें। 

उत्तर: आज यह तर्क लोगों के द्वारा दिया जाता है कि भारत और चीन उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में मौजूद एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था को चुनौती दे सकने की पूरी क्षमता रखते हैं। इस विचार के समर्थन में निम्नलिखित तर्क दिए जा सकते हैं:

  1. भारत व चीन दोनों विकासशील देश हैं तथा वर्तमान समय में ये उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएँ भी हैं। दोनों देश नई अर्थव्यवस्था, मुक्त व्यापार नीति, उदारीकरण, वैश्वीकरण और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के पक्षधर हैं। इसी कारण दोनों देशों की अर्थव्यवस्था विश्व स्तरीय अर्थव्यवस्था में अपना प्रभाव स्थापित कर रही हैं। इनकी ऐसी स्थिति ही अमेरिका वर्चस्व को चुनौती दे रही है।
  2. दोनों देशो की सैन्य क्षमता अपार हैं। चीन के पास विश्व की सबसे बड़ी विशाल सेना है तो भारत के पास भी एक विशाल सेना है। इतना ही नहीं दोनों देश आधुनिक शस्त्रों के भंडार से परिपूर्ण हैं अथवा दोनों ही परमाणु क्षमता से युक्त है। ऐसी सैन्य क्षमता जहां दोनों देशों को विश्व व्यवस्था में मैत्रीपूर्ण संबंधों की स्थापना में सहायक है वह अमेरिका के बढ़ते प्रभाव एवं उसके अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में मनमाने आचरण पर अंकुश लगाने में व्यवसायिक मानी जाती है।
  3. आज दोनों (चीन और भारत) देशों के बीच प्रौद्योगिक संबंधों में जो प्रगाढ़ता आई है वह इस बात का संकेत है कि वे आश्चर्यजनक रूप से प्रगति कर सकते हैं। दोनों देश (चीन और भारत) मिलकर अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से ऋण लेकर अमरीका जैसे शक्तिशाली देश का प्रभाव कम कर सकते हैं।
  4. चीन और भारत तस्करी रोकने, नशीली दवाओं के उत्पादन, विनिमय, वितरण, प्रदूषण फैलाने में सहायक कारकों और आतंकवादियों की गतिविधियों में पूर्ण सहयोग देकर भी विश्व व्यवस्था की चुनौती को कम कर सकते हैं, क्योंकि इन क्षेत्रों में सहयोग से कीमतों में होने वाली बढ़ोतरी पर रोक लगाई जा सकती है।
  5. चीन व भारत की जनसंख्या 200 करोड़ से भी ज्यादा है। जहाँ अमरीका के अधिकतर माल की खपत होती है। अधिक जनसंख्या होने के कारण इनके नागरिक विश्व के हर देश में पाए जाते हैं। इसके अलावा सस्ते श्रमिक भी इन्हीं देशों द्वारा दिए जाते रहे हैं।
  6. संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद् में चीन की स्थायी सदस्यता का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता हैं। वही भारत विश्व के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश की शक्ति के रूप में विश्व व्यवस्था में एक सक्रिय एवं प्रभावी भूमिका निभाने की क्षमता रखता है। इस तरह दोनों देशों की बढ़ती राजनीतिक क्षमता निश्चित ही अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती देने कि क्षमता रखती है।

प्रश्न 13. मुल्कों की शांति और समृद्धि क्षेत्रीय आर्थिक संगठनों को बनाने और मजबूत करने पर टिकी है। इस कथन की पुष्टि करें।

उत्तर: 

  1. विश्व के विभिन्न मुल्कों की शांति एवं समृद्धि के लिए क्षेत्रीय आर्थिक संगठनों के गठन एवं उनकी सुदृढ़ता आवश्यक है क्योंकि ये क्षेत्रीय आर्थिक संगठन कृषि, उद्योग धंधों, यातायात, व्यापार, आर्थिक संस्थाओं आदि को बढ़ावा देते हैं।
  2. इन आर्थिक संगठनों के बनने से लोगों को अनेक क्षेत्रों में रोजगार के अवसर प्राप्त होंगे, जिसके कारण इन देशों में बेरोजगारी कम होगी जो गरीबी को कम करने में एक महत्त्वपूर्ण सहायक तत्व माना जाता है। विशेष रूप में आर्थिक संगठनों के निर्माण से राष्ट्रों में समृद्धि आती है।
  3. जब लोगों में आर्थिक असमानता की धारणा घर कर जाएगी तो ऐसे में वे संगठन के माध्यम से इस आर्थिक असमानता के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाएँगे तथा इसके साथ ही श्रमिकों के शोषण को रोका जाएगा, उनको उचित मज़दूरी मिलने लगेगी, जिसके कारण उनकी क्रय-शक्ति में भी बढ़ोतरी होगी तथा वे सभी अपने परिवार के शिक्षा व स्वास्थ्य के लिए अच्छी सुविधाएँ प्रदान करेंगे।
  4. प्रत्येक देश अपने व्यापार को बढ़ाने के लिए आर्थिक क्षेत्रीय संगठनों से सहयोग माँगते हैं तथा इसके बदले में उन्हें भी अपने पड़ोसी देशों को इस प्रकार का सहयोग देना होता हैं। प्रत्येक देश चाहता है कि उन्हें अपने उद्योगों के लिए कच्चा माल उपलब्ध हो तथा तैयार माल के भी खरीददार हो। क्षेत्रीय आर्थिक संगठनों के सहयोग से यह कार्य पूरा किया जाता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि क्षेत्रीय संगठनों का अंतर्राष्ट्रीय बाजारीकरण के साथ भी गहरा संबंध हैं।
  5. क्षेत्रीय आर्थिक संगठन विभिन्न देशों में पूंजी निवेश, श्रम गतिशीलता, यातायात सुविधाओं के विस्तार, शिक्षा ऊर्जा उत्पादन में सहायक होता है। यूरोप एशिया और अपने क्षेत्रीय संगठन का प्रत्येक वर्ष शिखर सम्मेलन होता है जिसमें वे विभागीय गतिशील योजनाएं बनाते हैं।

प्रश्न 14. भारत और चीन के बीच विवाद के मामलों की पहचान करें और बताएँ कि वृहत्तर सहयोग के लिए इन्हें कैसे निपटाया जा सकता है। अपने सुझाव भी दीजिए।

उत्तर:  भारत और चीन के बीच विवाद के मामले निम्नलिखित है:

  1. 1962 में चीन ने लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश पर अपने दावे को जबरन स्थापित करने के लिए भारत पर आक्रमण कर दिया था जिसकी परिणामस्वरूप ‘हिंदी चीनी भाई-भाई’ की भावना और एशिया के दो महान पड़ोसी देशों के सदियों पुराने चले आ रहे मित्रता के संबंधों को गहरी ठेस पहुँची।
  2. 1965 में जब पाकिस्तान ने भारत पर आक्रमण किया तो चीन ने उसकी मदद करके भारतवासियों की भावनाओं को ठेस पहुँचाई। स्वभाविक तौर पर दोनों देशों के संबंध और खराब हो गए।
  3. पाकिस्तान के साथ संधि करके चीन ने कश्मीर का कुछ भाग अपने अधीन कर लिया जिसे तथाकित पाकिस्तान द्वारा हड़पे गए कश्मीर का हिस्सा माना जाता है।
  4. चीन भारत की परमाणु परीक्षण परीक्षणों का विरोध करता हैं जबकि वह स्वयं परमाणु अस्त्र शस्त्र रखता है तथा पाकिस्तान को परमाणु शक्ति संपन्न चीन द्वारा ही बनाया गया है।
  5. 1950 में चीन द्वारा तिब्बत को हड़पने तथा भारत-चीन सीमा पर बस्तियाँ बसाने के निर्णय के बाद दोनों देशों के बीच संबंध बहुत बिगड़ गए।

वृहत्तर सहयोग के लिए भारत-चीन मतभेदों को निपटाने के लिए निम्नलिखित सुझाव दिए जा सकते हैं:

  1. परस्पर सहयोग: दोनों देश अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यथासंभव परस्पर सहयोग देकर विकसित देशों से आर्थिक, वैज्ञानिक तथा सैनिक साज-समान की उन्नति के लिए सहयोग प्राप्त कर सकते हैं। जो भी देश आतंकवादी शिविरों का संचालन कर रहे हैं उनके विरुद्ध संयुक्त दबाव डालने की नीति अपना सकते हैं। दोनों देश पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण फैलाने वाली समस्याओं के समाधान में सहयोग दे सकते हैं।
  2. सांस्कृतिक संबंध: दोनों देशों में सांस्कृतिक संबंध स्थापित हों। भारत के कुछ लोग चीनी भाषा और चीनी साहित्य का अध्ययन करने के लिए चीन जा सकते हैं और कुछ चीनी नागरिक हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं का साहित्य के अध्ययन के लिए भारत आ सकते हैं। दोनों देशों में चित्रकला, वास्तुकला, मूर्तिकला, नृत्य-कला, फिल्मों आदि का आदान प्रदान किया जा सकता है।
  3. व्यापार को बढ़ावा: भारत और चीन में आंतरिक व्यापार को बढ़ावा दिया जा सकता है। दोनों देशों में कंप्यूटर से संबंधित सॉफ्टवेयर के आदान-प्रदान किया जा सकता हैं।
  4. शांति एवम् सद्भाव: दोनों देशों के प्रमुख नेता समय-समय पर एक दूसरे के विचारों का आदान- प्रदान करें जिससे दोनों देशों में सद्भाव और मित्रता स्थापित हो।
  5. नीतिगत बदलाव: दोनों देशों को अपना अंतरराष्ट्रीय प्रभाव बढ़ाने के लिए अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपने हितों एवं एशियाई क्षेत्र व हितों के दृष्टिगत समान नीतियाँ बनाने का प्रयास करना चाहिए।

दोनों देशों की सरकारें बातचीत के द्वारा हर समस्या का समाधान निकाल सकती हैं। दोनों ही देश की एक जैसी अनेक समस्याओं जैसे जनसंख्या वृद्धि, बेरोज़गारी, निबंध भौतिक जीवन स्तर आदि से जूझ रहे हैं। दोनों ही देश एक-समान समस्याओं से ग्रस्त हैं जिसे आपसी बातचीत द्वारा सुझाया जाना चाहिए।


सत्ता के वैकल्पिक केंद्र NCERT Solutions Class 12 Political Science – विद्यार्थी अध्याय 2, अध्याय 3, अध्याय 5, अध्याय 6, अध्याय 7, अध्याय 8, अध्याय 9  के सभी प्रश्न व उत्तर निम्नलिखित ‘LINKS’ के माध्यम से प्राप्त कर सकते हैं:

Chapter 2: The End of Bipolarity अध्याय 2: दो ध्रुवीयता का अंत
Chapter 3: US Hegemony in World Politics अध्याय 3: समकालीन विश्व में अमरीकी वर्चस्व
Chapter 4: Alternatives Centres of Power अध्याय 4: सत्ता के वैकल्पिक केंद्र
Chapter 5: Contemporary South Asia अध्याय 5: सत्ता के वैकल्पिक केंद्र
Chapter 6: International Organisations अध्याय 6: समकालीन दक्षिण एशिया
Chapter 7: Security in the Contemporary World अध्याय 7: समकालीन विश्व में सुरक्षा
Chapter 8: Environment and Natural Resources अध्याय 8: पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन
Chapter 9: Globalisation अध्याय 9: वैश्वीकरण

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